पत्थर
पत्थर
पड़ा रहता है यूँ ही बेदर्द-सी सर्दी में।
तपता रहता है यूँ ही गर्मियों की धूप में।
भीगता रहता है यूँ ही घनघोर-सी बरसात में।
खाता है ठोकरें ना जाने कितनी ही??....
अपने पूरे जीवन काल में।
पत्थर ही तो है।
इसे क्या महसूस होता है भला??....
यह सोचकर बाकी और कुछ,
कोई सोचता ही नहीं उसके विषय में।
भूल जाता है इंसान कि,
जिस पत्थर को ठोकर मारता है वह।
ना जाने कितनी ही बार अपने जीवन में??....
एक मुसीबत आने पर,
उसी पत्थर से बनी ईश्वर की मूरत के सामने।
हाथ जोड़ खड़ा नज़र आता है मंदिर में।
इसी पत्थर के एक रूप (हीरे) को।
रखने को अपनी तिजोरी में।
इंसान ना जाने कितनी मेहनत करता है??....
अपने पूरे जीवन में।
फिर उसको पा लेने पर।
अपनी मन्नतें पूरी हो जाने पर।
आ जाता है वापस अपने उसी रंग-ढंग में।
मारता है ठोकरें फिर उसी पत्थर को सड़क पर।
यह तो अचेतन है।
इसे दर्द नहीं होता।
पत्थर ही तो है।
इसे क्या महसूस होता है भला??....
यह सोचकर बाकी और कुछ,
कोई सोचता ही नहीं उसके विषय में।
भले ही अचेतन हो पत्थर।
भले ही दर्द ना महसूस कर पाता हो पत्थर।
पर कम नहीं है किसी से यह पत्थर।
अपने कई रूपों में बड़ा ही दुर्लभ और
अनमोल है यह पत्थर।
अगर ना होता काम का यह पत्थर।
तो लोग यूँ ही नहीं करते जीवन में इतनी मेहनत।
लगवाने को अपने मकानों में संगमरमर।
भले ही अचेतन हो पत्थर।
भले ही दर्द ना महसूस कर पाता हो पत्थर।
पर कम नहीं है किसी से यह पत्थर।
लोग कहते हैं कि,
कुछ महसूस नहीं करता यह पत्थर।
पर एक बात तो सोचो ज़रा कि आजकल तो,
महसूस कहाँ कुछ करते हैं लोग भी??....
क्योंकि आजकल तो लोगों का,
दिल भी होने लगा है पत्थर।
यह देखकर इंसानों की मूर्खता पर,
हँसता तो खूब होगा पत्थर।
हँसता तो खूब होगा पत्थर।
यह तो अचेतन है।
इसे दर्द नहीं होता।
पत्थर ही तो है।
इसे क्या महसूस होता है भला??....
यह सोचकर बाकी और कुछ,
कोई सोचता ही नहीं उसके विषय में।
पर याद है ना दोस्तों।
बरसों पहले यह पत्थर ही काम आए थे।
रामसेतु को बनाने में।
सिया-राम को मिलाने में।
तो भला कैसे बेकार हुए यह पत्थर??....
जो खाते हैं यह इतनी ठोकरें अपने जीवन में।
पड़े रहते हैं यूँ ही बेदर्द-सी सर्दी में।
तपते रहते हैं यूँ ही गर्मियों की धूप में।
भीगते रहते हैं यूँ ही घनघोर-सी बरसात में।
पत्थर ही तो हैं।
इन्हें क्या महसूस होता है भला??....
यह सोचकर बाकी और कुछ,
कोई सोचता ही नहीं इनके विषय में।
