पत्ता
पत्ता
बेजान हो गया वो, कभी जो था हरा भरा।
एक पत्ता टूटा पेड़ से, और ज़मीं पर जा गिरा।।
एक अरसे से, शोभायमान था जो शाख पर।
आज सूख कर गिरा वो, अंततः धूल से भरा।।
बहती हवाओं संग खेलना ही, पसंद था उसे।
आज उन्हीं हवाओं संग, वो बहता चला गया।।
रीत है ये दुनिया की, इसे कौन बदल सका।
जाते जाते ही ये बात वो कहता चला गया।।
सावन फिर से आएगा,और शाख फिर भरेगी।
पतझड़ तक ही शायद, इसकी कमी खलेगी।।
मुकाम इसका है अब, कि मिट्टी में मिल जाना है।
फिर से मिलेगा नवजीवन, चक्र को दोहराना है।।
