प्रकृति के कण कण में
प्रकृति के कण कण में
प्रकृति के कण कण में विद्यमान होती है चेतना।
इसके प्रत्येक अंग में प्रसन्नता एवं होती है वेदना।
ईश्वर द्वारा रचित प्रकृति है संरचना अप्रतिम अदभुत।
जीवन के पोषण हेतु हितकारी नहीं इसकी अवहेलना।
उद्गम स्थान से निकलकर, समुद्र में हैं समाती नदियां।
हिमखंड से पिघलकर पहाड़ों से करती कलाबाजियां।
निडरता का रूप धारण किए राह ये नदियां बनाती हैं।
कहीं झरना, कहीं मौन लिए, कहीं चंचल अंगड़ाइयां।
जल के अथाह कुंड को समाए हुए अपने भीतर।
घुमड़ घुमड़ उड़ते भटकते फिरते बादल इधर उधर।
सूखी धरती को तरने को आतुर पर्वत से टकराते हैं।
सबकी प्यास को बुझाएं अपना अस्तित्व मिटाकर।
हरे भरे वृक्ष अपने जीवन चक्र में कई कई रूप धरते।
सूक्ष्म बीज से उत्पन्न होकर विशालकाय वृक्ष बनते।
अपने जीवन काल में फल फूल हमें करते हैं प्रदान।
ये भी प्रसन्न होते हैं तो खूब इठलाते बलखाते रहते।
वायु भी तो बहे मदमस्त होकर, जब मौसम सुहाना हो।
खूब शोर मचाए, जब इसको वर्षा को शीघ्र बुलाना हो।
शीतल और जीवन दायिनी स्वाभाविक रूप सदैव रहे।
अंत्यंत वेग से बहे, विनाश लाए, यदि क्रोध आना हो।
