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Ms. Nikita

Romance

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Ms. Nikita

Romance

प्रेम..

प्रेम..

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मन मेरा विचलित है

स्वयं के लिए ही व्यथित है

लगा मेरा व्यक्तित्व सलोना है

पर यह सिर्फ मनमोहना है


उसके प्रेम आईने में ढलकर

मुझे स्वरूप संवारना है

खुद को उसमें ढालकर

परारुप निखारना है


उसका हृदय निर्मल अमृत है

सर्वसुख में सम्मिलित है

परहृदय के उद्भावों का

उद्गार मेरा कर्तव्य है


उसका हृदय रुपी

प्रेम मेरी धरोहर है

उसे सहेजकर

सर्वदुख भागिनी बनना है


यही मेरी प्रेम परिभाषा है

एवं स्वर्ण सलिला आशा है।


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