प्रेम ये प्रेम
प्रेम ये प्रेम
प्रेम में मैंने महसूस किया है सदा
काली अँधेरी रात के बाद रवि किरणों को।
दिन भर के थकान के बीच
सुरमई शाम को।
और इतना ही नही उमस भरी गर्मी
के बाद रिमझिम बरसात को।
प्रेम में मन की आँखों से तुम्हें पढ़ना,
रोज कल्पनाओं के नित नूतन महल गढ़ना,
पाने खोने की परिकल्पनाओं से ऊपर
बस तुम्हें सोचकर
तुम्हें देखकर
तुम्हें सुनकर
सदा ही आनंदित होना।
प्रेम में मिलन की चाहत से ऊपर उठना,
तुम्हारा मुझे समझना,
हर मौसम बसंत का अनुभव,
जीवन में उम्मीद के कोंपलों का खिलना।
प्रेम ने ही सिखाया मुझे
जिंदगी से प्यार करना।
आत्मविश्वास संग जीना,
चट्टानों सा मजबूत बनना,
और
जीवन के हर जंग में अपराजिता सम बनना।
प्रेम की सुरभि से
दुनिया को सुरभित करना।
प्रेम ने ही मुझे स्वयं से पहचान कराई,
प्रेम में खुद को प्रेममय करना।

