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Sudha Sharma

Inspirational

4  

Sudha Sharma

Inspirational

प्रायश्चित

प्रायश्चित

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एक युवती का किशोरी के रूप में की गई गलती का प्रायश्चित 
पिता को पत्र 

हे बाबा! पत्र लिख रही हूॅं पर तुम पढ़ ना पाओगे 
पर अनंत प्रेम करते हो माफ तो कर जाओगे। कसम खाकर कहती हूॅं बाबा! उस समय नादान थी 
दुनिया की चालाकी और धृष्टता से अनजान थी 
मुझे पति पत्नी के रिश्तों का पता नहीं था।
बस फिल्मी प्रेम का असर था।
तभी तो उस युवक को एकांत में छत पर बुलाया था 
पूरे घर की बदनामी का परचम लहराया था। 
आज जानती हूॅं 
मेरा अपराध माफी के योग्य नहीं 
मैं तेरे प्यार के और बेटी कहलाने के योग्य नहीं 
उस क्षण को याद करूं 
तो सामने आने का साहस न जुटा पाऊॅंगी तुम्हारे पवित्र प्रेम के समक्ष सिर न उठा पाऊॅंगी 
अब पता चला वह प्यार नहीं 
केवल दैहिक आकर्षण का था जादू 
उसकी आकर्षक आंखों को देख नहीं कर पाई स्वयं पर काबू ।
उस पल कितना अपमान हुआ यह आज समझ में आता है 
तेरी पीड़ा याद कर मन मेरा भर आता है।
अब तो मैं घर भी न लौट पाऊॅंगी 
विषय की गंभीरता जानती हूॅं 
तेरे विनाश की मूल ‘मैं’ थी ऐसा मानती हूॅं। लेकिन विश्वास करो 
बाबा! उसके हाथ में कलावा था 
उसने अपना नाम मुझको पावक बताया था तुम्हें याद है न बाबा! 
आपने पावक का अर्थ अग्नि बतलाया ।
अग्नि अग्रणीय भी होती है ऐसा मुझको समझाया था ।
बस यही भूल हो गई
अग्रणीय नहीं वह आग था 
जिसमें मेरा ही नहीं मेरे परिवार का अस्तित्व मिट जाना था ।
मुझे आज भी अपनी छोटी सी गुड़िया समझ लेना ।
तेरे निश्छल प्रेम को अपना केवल अधिकार मान लेना।
मेरी कृतघ्नता चरम हो गई तभी तो भूल गई 
बस्ता कंधे पर रख मुझे विचरने की स्वतंत्रता देना तेरा प्यार था न कि मेरा अधिकार 
मैं ही तेरे सारे लाड़ भूल गई 
उस धूर्त के नाग पाश में बंध गई 
अब विवेक जाग गया है
 पीतल को समझने का भ्रम साल गया है लेकिन अब बहुत देर हो गई बाबा!
आत्मा छलनी - छलनी हो गई बाबा!
अपने इन हाथों से बीफ भी पकाती हूॅं ।
अपनी आत्मा को रात दिन जगाती हूॅं ।
लेकिन 
अब घोर अंधेरा है 
किसी झरोखे से भी न दिखता सवेरा है। 
बस ईश्वर से इतनी प्रार्थना है 
तेरे जैसा बाप सबको देना 
पर, मेरे जैसी बेटी किसी की गोद में न देना। लेकिन 
मैं अब भी शिकायत तुझी से कर पाऊॅंगी 
उसका विरोध किया तो पैंतीस टुकड़ों में कट कट जाऊंगी 
फिर लावारिस लाश की भांति इधर-उधर फेंकी जाऊॅंगी ।
मुझे अब इस तन पर से प्यार नहीं
पर मन में अटल निश्चय है
मुझे इस युद्ध में उतरना है 
अग्रिम पीढ़ी को सबक सिखाने के लिए सबूत की तरह उभरना है।। डॉ सुधा शर्मा ‘आर्या’ 


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