मुक्तक
मुक्तक
मोबाइल पर कुछ मुक्तक
मोबाइल कलयुगी मात पिता,
सखा बंधु व भ्रात।
मोबाइल बिन न भाए भैया,
समक्ष रखा भात ।।
मोबाइल के आसरे,
कटते दिन और रैन।
मोबाइल न हो हाथ में,
भटके इत उत नैन ।।
जो चाहे सो देखिए ,
मोबाइल पर पूरा ज्ञान।
पांच साल का बालक बने,
पच्चीस का नौजवान ।।
मोबाइल के कारणे,
पूर्ण समाज से दूर ।
बच्चे खेले गेम्स तो,
बूढ़ों पर बरसे नूर ।।
मोबाइल बचपन छीन रहा,
सामाजिकता छिन्न भिन्न ।
मोबाइल आज का देवता,
कोई हो सके न उऋण।।
मोबाइल के कारणे,
नित बच्चे खाते डांट,
मोबाइल न छूट सके,
छूटे चाहे मां-बाप।।
मोबाइल पर हो जाती,
बिन अस्त्र लूट और पाट।
पल में करोड़ों की ठगी,
रोते ग्राहक दिन रात।। डॉ सुधा शर्मा आर्या
