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Neelam Sharma

Classics

4  

Neelam Sharma

Classics

प्राण पखेरू

प्राण पखेरू

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हुआ जाता दूर प्राण पखेरू, थामा लेकिन थमा नहीं,

देवदूत के पंख लगाकर, सुन आत्मा भटक रही है।


निज लोभ बढ़ा मानव मन,अधर्म हुआ विकसित,

नस-नस में सबके,अनंत हैवानियत लहक रही है।


आजकल की जिंदगी, क्यों नीचे धँस रही है?

उन्नति बन विधवंस नीलम, जग पर विहँस रही है।


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