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Neelam Sharma

Classics Fantasy

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Neelam Sharma

Classics Fantasy

मैं अपलक राह निहारूँ

मैं अपलक राह निहारूँ

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मैं अपलक राह निहारूँ

मनमोहन कहाँ रह गए!

सुधि-चेतन कान्हा वारूँ,

मनमोहक बैन कह गए।

मैं अपलक राह निहारूँ।


यमुना तट की रज पूछे,

कहाँ गए नंदलाल?

मोर पंख भी व्याकुल होकर,

ढूँढ़े श्याम नंद लाल।


बंसी की मधुरिम तानें,

अब भी कानों में बजती हैं,

श्याम बिना ये साँसें जैसे

सूनी वीणा सी लगती हैं।


मंद पवन भी आज पूछे,

श्याम कहाँ छिप गए ? हाय!

राधा मन की विरह व्यथा को

कौन यहाँ समझाए?


आओ कान्हा एक बार,

नीलम नैनों में बस जाओ।

प्रेम सुधा की वर्षा करके

मन का ताप मिटाओ।


मैं अपलक राह निहारूँ,

मनमोहन अब आ भी जाओ।

भक्त हृदय की इस वीणा को

अपनी बंसी से जगाओ।


मैं अपलक राह निहारूँ

मनमोहन कहाँ रह गए…


✍️ **नीलम शर्मा**



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