पिंजरे के पंछी
पिंजरे के पंछी
देख उड़ते पंछियों को
पंख फड़फड़ाने लगा
पिंजरे में कैद पक्षी
मुक्ति को छटपटाने लगा
कोशिशें कर करके हारा
चोंच मारे, पंख मारा
कर न पाया मुक्त खुद को
थक गया कर प्रयत्न सारा
है निरखता एकटक वो
ताकता है आसमां
कब तलक बरसेंगे अश्रु
मुक्ति का होगा समां ?
हार थक कर सोचता है,
सुख मुझे तो सब मिले हैं
स्वर्ण पिंजरा, स्वर्ण दाने
स्वर्ण हीं साँकर मिले हैं
पर मिला न नभ खुला
जिसमें उड़े जी भर सभी
अपनी मर्ज़ी से न सीखा
अब तलक जीना कभी
एक रोज़ मिला जो अवसर
खोल पिंजरा , उड़ चला वो
दूर कुछ करके सफर तय
लौट आया क्यों भला वो
कर न पाया सामना वह
मुक्त दुनिया के गगन से
भूल गए थे पंख उड़ना
क्या प्रयत्न करता लगन से
पर भरे विश्वास से वह
फिर उड़ा फैलाये पंख
देख ऊंचाई से जग को
भर गया उसमें उमंग
मिल गए उसको भी साथी
साथ उसके इस डगर में
था अटल विश्वास उसके,
आत्मबल था अब सफर में।
