पीठ में खंजर
पीठ में खंजर
बर्दाश्त की इंतहा हुई,
शीश कब तक झुका रहे
साथ में खड़े रहो सब
पहरेदार सा डंटा रहे
शीतल मेघ मान हम ने
झुका लिए थे सिर कभी
आग जो गिरने लगे अब
हो गयी इन्तहां अभी
उनके नैन में शील नहीं
खंजर वो चुभो रहे
कैसे यकीन अब हमें
कैसे अब भी चुप रहे ?
