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Shahwaiz Khan

Abstract

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Shahwaiz Khan

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पहला प्यार

पहला प्यार

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वो इस तरह कुछ 

कभी कभी बात करता है

जैसे दुनिया बनाने वाले से

ख़ुद रूबरू होकर आया है

उसकी हर एक बात पर

लोग इस तरह यक़ीन करते हैं

जैसे पत्थरों पर खींची लकीरे है

तमाम ज़मी पर जब प्यास की दरारें पड़ जाती है

ख़ुद प्यास भी जब प्यास से लिपट जाती है

उस वक्त उसे जब देखते हैं

प्यासे तो प्यासे

प्यास भी उसके दामन से ठण्डक लेती है

मैं मुसव्विर हूँ

रंगो का पेशेवर हूँ

मगर रंगो में उसके रंग जब ढूंढता हूँ

रंग बोझल पड़ जाते हैं

कोई रंग उसके रंग सा नहीं है

मैं किताबों में उसकी मिसाल खोजता हूं

पर्वत पर जैसे संजीवनी ढूँढता हूँ

 बारिश में

 आग में

 हवा में

 ज़मीन में

आसमान में

 पाताल में

 रेत में

 झील में

 नदिया में

 गहरे समन्दरों में

कहाँ कहाँ ढूंढ ढूंढ़ कर

 थक हार कर

 जब ख़ुद को देखता हूं

 आँख बन्द करके

 कहीं हो ना हो पर

 तू मुझ में है

जबसे मैं हूँ

तब से

जब से चाँद सूरज है तबसे

या सबसे पहले से

तू है

तू है

हाँ तू है


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