"फिर से वही बात"
"फिर से वही बात"
आज फिर से हो गई, वही बात
कामचोरों को मिल रही है, दाद
बड़े बदनसीब हुए है, आजकल
हम ईमानदार लोगों के हालात
मेहनत तो करते है, हम जनाब
आलसी जन पा जाते, खिताब
बहुत गिरने लगते है, उल्कापात
जब भी बोलते है, सच अल्फाज
अपने ही सीने में दफन हुए है,
आजकल खुद के ही जज्बात
बेईमानों ने कुछ यूं मारी लात
आंसुओं की हो रही, बरसात
उसे मिलता कठिन, क़िरदार
जो पढ़ता है, संघर्ष किताब
जो करता शूलों से मुलाकात
वही पाता फूलों की बारात
भूल जा ज़माने की हर बात
याद रख खुद से की हुई बात
तुझे छूना है, अगर आसमान
कर्म कर तू, साखी लगातार
बाकी सब कुछ तू छोड़ दे
भगवान पर अपने हालात
तू सही है, न दे जग को हिसाब
वो खुदा दिखाएगा करामात
जल जायेगा चोरों का मकान
रहेगा बस सच्चाई का निशान
कितना घना क्यों न हो, अंधकार
एक किरण से मिटता, तम स्थान
भूल कामचोरों के जुल्म तमाम
कर्म करता रह, तू बस ईमानदार
कितने ही टुकड़े क्यों नहीं हो
एक आईने के फिर श्रीमान
जो शीशे संघर्ष में पाते, स्थान
वो देते अक्स देते, लाजवाब
जो तूफानों में पलता है, इंसान
वो ही परिंदा बनता आसमान।
