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Ashish Anand Arya

Abstract

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Ashish Anand Arya

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फेरों से पहले तेरे

फेरों से पहले तेरे

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वो छोटी सी रात

कितनी जागी थी बेहद !

मेरी बनकर तुम

सच हो आई थी

जैसे माँगी हर मन्नत

हर घड़ी ही तो उस रात फिर

नींद से उधार माँगी थी बेहद !


थकान का बदन पर

ज़रूर भारी था उत्पात

पर बातों पर तुम्हारी

मन मान ना रहा था कोई हालात

पल-पल पर याद आती


छुई-मुई सी मासूम उंगलियों की बात

वो सगाई का मौका

तुम्हारी नज़दीकी से

बेहतरीन वो मेरी मुलाकात,

जहाँ पर जुनूनी मेरे

सब सारे तुम्हारे रंग


तुमसे दूर इस गहरे अंधेरे बीच

भर रहे थे लगातार करवट

महसूस हो रहा था पुरजोर

हवाओं ने वही आग

उधर भी सुलगाई थी बेहद !


सुरूर मे शादी के

जानते थे दोनों

अभी लंबा वक़्त था.

अहसास बोल रहे थे भीतर

हर लम्हा ये कितना सख़्त था.


एक बार उंगलियों ने

जो उंगलियों को छुआ था

धड़कन बन कर जी रहा भीतर

वही तो चुभता वक़्त था,

बस ख्वाहिश थी

ये रात ख़त्म ना हो

आरजू थी


इन हालातों पर कोई अंत ना हो

पर दूरी बन कर जो तोड़ रहा था भीतर

तुम्हारा अहसास

भीतर तड़पता बड़ा नम था

हर एक स्पर्श का

जिस्म के रोम-रोम पर बड़ा ही ताज़ा रंग था


भीगती पलकों पर

नहीं असर दिखा पा रहे थे

इंतजार के बाँधे बंध

पर हालात थे सब

मुहब्बत के ऐसे दिलकश


यूँ-ही तुमको

महसूस करते रहने की चाहत में

पूरी-पूरी रात

नींद से उधार माँगी थी बेहद !


आज भी रातों पर अपनी

ढेर अरमान भरते हैं

हां ! नींद से उस कदर

आज कतई नहीं लड़ते हैं

कि तुम होती हो इतनी नज़दीक

सुकून पर बिछकर


चैन की नींद से गुज़रते हैं,

पर जब कभी भी

दिन या रात के किसी पहर

टूटता है ये नींद का दायरा

चाहे जिस कदर


तुम्हारी पलकों भीतर बंद जहान में

क़ैद ख्वाबों की थाह लेता हूँ

जो बार-बार बन बिगड़ते हैं,

सोते तुम्हारे चेहरे पर अक्सर

काफ़ी देर तक खामोश मैं निहारता हूँ


तुम्हारे चेहरे की रंगत

फिर झट अपनी बाँहों मे

बड़ी ज़ोर से भर लेता हूँ हर करवट,

सोते-सोते ही खिलखिला उठती हो

तुम जैसे कसमसा कर


तुम मेरी दुल्हन

मेरी बाँहो मे सिमट कर बेहद

हमेशा सी मेरी बन कर बेशक

मेरे संग

शायद अपनी खुशी में बेहद !


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