STORYMIRROR

Kanchan Prabha

Abstract

3  

Kanchan Prabha

Abstract

फागुन की दस्तक

फागुन की दस्तक

1 min
293

देखो देखो आज यहाँ

सब का मन है

रंगों से अब नहाने को


भीनी भीनी खुशबू से

हुआ बेचैन ब्यार

फगुआ संग बह जाने को


हर तरफ खुशहाली है

लगने लगी बाजार अब

रंग पिचकारी सजाने को


घर घर पर्ची सामग्री की

लगे हैं तरह-तरह के बनने

लजीज पकवान बनवाने की


लगे हिलोरे लेने अब तो

गली गली बेचैन है

'होली है' चिल्लाने को।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract