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Saroj Garg

Tragedy

4  

Saroj Garg

Tragedy

पेड़ों का दर्द

पेड़ों का दर्द

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धरती कराह रही है, अम्बर कराह रहा है,

पेड़ों के काटने से, जन-जन कराह रहा है। 

इनके भी आँसू बहते इनको भी पीड़ा होती,

पेड़ों के काटने से, संसार कराह रहा है। 

धरती की करुण कहानी, सुनो अम्बर की जुबानी। 

 पक्षी तड़प रहें हैं, पशु भी तड़प उठे हैं। 

 इनकी व्यथा सुनो तुम, हर कण कराह रहा है।

पेड़ों के काटने से जन जन कराह रहा। 

वायु भी रो रही है, सूरज भी रो रहा है,

इनकी व्यथा सुनो तुम कण-कण कराह रहा है। 

    विज्ञान ने किया क्या 

पृथ्वी का सीना चीरा ।

    इस उन्नति से अब तो चन्दा कराह रहा है। 

मंगल कराह रहा है सब ग्रह कराह रहे हैं। 

पेड़ो के काटने से जन जन कराह रहा है। 

 धरती कराह रही है अम्बर कराह रहा है, -----

  

 पेड़ों से बचेगी धरती, पेड़ों से होगी वर्षा,

  खेतों में अनाज होगा, जीवन खुशहाल होगा। 

मत काटो हमको प्राणी , पृथ्वी हरी रहेगी ,

 जीवन सुखी रहेगा , हर जर्रा खुश रहेगा ।

धरती कराह _

  छाया पथिक को देता , फल फूल तुमको देता ,

 कुल्हाड़ी चलाते मुझ पर, मेरा सीना छलनी करते ।

 मत काटो प्राणी हमको, हम तुमको सासें देते ।

 हर ओर खुशहाली होगी, वादा ये सदा रहेगा। 

  धरती कराह---------------


 सब कुछ तुम्हें दिया है , लेना नहीं है हमको ,

 दूषित हवा को लेकर , वातावरण को शुद्ध करते । 

   मेरा दर्द तुम भी समझो , मेरी गुहार है ये ,

 मैं दुःख का तुम्हारा साथी , मेरी पुकार है ये ।

 धरती कराह रही है अम्बर कराह रहा है,

 पेड़ो के काटने से जन जन कराह रहा। 



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