पापा जी
पापा जी
मेरे पापा... मैंने इक शख्स को खुद से लड़ते देखा।
उम्र भर वैसा फिर ना कोई शख्स देखा।
मेरे पापा _ जी हां मेरे लिए दुनियां के सबसे अच्छे और समझदार इंसान।
मैंने बचपन में ही उनको खो दिया।
पर जितना भी साथ ईश्वर ने लिखा बहुत खूबसुरत मगर कम दिया।
बचपन में जब भी किसी चीज की इक इच्छा होती ।
इक आवाज़ में वो हाज़िर होती।
अपने परिवार के सबसे बड़े बेटे, जिम्मेदारियों ने उन्हे बहुत परिपक्व बना दिया।
बहनों के भाई के साथ- साथ पिता होने का हर फर्ज पूरा किया।
स्वयं के लिए कभी उनको ना सोचते देखा।
हर रिश्तें में सिर्फ उन्हे देते देखा।
एक सफ़ल व्यवसायी, आर्दश पति फिर श्रवण सा बेटा।
जिससे हर किसी को उम्मीद ही होती कि ऐसा हो हमारा बेटा।
किसी को अपने से मायूस ना किया।
उस इंसान ने बस हर रिश्तें को मजबूत किया।
अपनी संतान की हर छोटी सी उपलब्धि पर खुश होते देखा।
मैंने इक शख्स को सबसे खुश होते देखा।
हृदयाघात जैसी बीमारी ने उन्हे कुछ तोड़ दिया।
पर फिर भी जीने के अंदाज को ना बदलते देखा।
सिर्फ दिया और उम्रभर सबको सहयोग दिया।
अपना सर्वस्व सौंप कर बच्चो को सहयोग दिया।
खाली जेब जीवन में कभी किसी को ना दिखाई।
एल एम वेस्पा स्कूटर से अपनी खुशी जताई।
बेटी और बेटे में ना फर्क किया।
पढ़ाई और अनुशासन जीवन संवार दिया।
उम्मीद जिसने भी की उसे ना फिर मायूस देखा।
अपने हिस्से की थाली का भी बांटते देखा।
मैंने इक शख्स को स्वयं से लड़ते देखा।
उम्रभर ना वैसा फिर कोई शख्स देखा।
