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Sachin Gupta

Abstract Tragedy

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Sachin Gupta

Abstract Tragedy

पाखंड

पाखंड

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ऊपर मालिक बैठा है

हर रोज तमाशा होता है

फिर भी मालिक चुप बैठा है 

नाम पर उसके

हर रोज तमाशा होता है 

पर बोले कौन

पाखंड के आगे

वो नास्तिक कहला जाता है।


अरे सौ सच पर एक झूठ पड़ा भारी है

सच बोलने वालों को देनी पड़ती कुर्बानी है

अजीब – अजीब पैतरे देखे

जादू -टोना और ना जाने क्या – क्या देखा

पाखंड रहा सदा से भारी है।


अरे चीख – चीख कर कहता पाखंड है

उसका पलड़ा रहा सदा भारी है 

मुरदों के साथ जलती रही सदा नारियाँ

ज्ञानी फिर भी मौन थे

पाखंड के आगे बिक जाता गरीब

फिर भी शासक रहे मौन थे।


इज्जत इंसान की उतर गई 

गरीब के घर जो मौत आई

चीता जलाने को न था रुपया 

फटी हुई थी जेब।


मुर्दा घाट पर जब पहुँचा मुर्दा

चीता जलाने को चांडाल

 बोल पड़ा अपनी बोली

गरीब के घर ना थी धोती

फटी साड़ी से ढाका मिला था मुर्दा।


अब पाखंड बहुत होना था

श्मशान घाट पर चांडाल बना व्यापारी था

अभी कर्म कांड बाकी था।


मानव के घर से मानव गया

घर में खाने को था अन्न

पर मृत भोज अभी बाकी था

ब्राह्मण को जीमना बाकी था

गाँव समाज में छुटका मिटाना बाकी था

पाखंड का नृत्य देखना अभी ओर बाकी था।


बालक को पीने को दूध नहीं

स्वर्ग लोक के नाम पर गौ -दान बाकी था

जिस माँ की छाती में दूध नहीं

घर का मालिक दुनिया छोड़ गया

कहाँ से लाए दान को गौ

तमाशा अभी बाकी है

घर की नीलमी बाकी है

ताक लगाए बैठे है लोग

कर्ज का चादर अभी बढ़ेगा

मजबूर हो हालत से मजबूर

बेच आई माँ की निशानी

पाखंड के आगे मातम अभी बाकी है


धर्म के ठेकेदार बहुत है

मजहबी बातों पर लड़ने वाले बहुत है

पर पाखंड के आगे कौन लड़ेगा

मुझको भी दुनिया में जीना था

आँखें बंद कर मैं भी चुप बैठा था

पर कवि मन मेरा रोक न पाया खुद को

तीखी बातें सीधे बोल गया

पर लगता है मुझको

अभी कुछ ओर कहना बाकी है।

  

बहु विवाह , बाल विवाह और ना जाने क्या- क्या 

कहा गया ये प्रथा रही हमारी है

हमने तो जाना ये इतिहास के पन्नों से

ओह पाखंड का रहा सदा भारी है |


अब नई सदी में , नई बात कहता हूँ

धर्म के ठेके खुले है

जाना जरा सम्हल के

सौ सच पर एक झूठ रहा सदा भारी है।


देखा जब इतिहास के पन्नों को

जी भर रोना आया था

कैसे कहते हो तुम खुद को मानव 

देकर बलि लाचार कि 

कैसे तुमने अघोरी की प्यास बुझाई

पाखंड है , ये पाखंड है।


बहुत से किस्से है

बहुत सी है कहानियाँ 

जितनी बात बताऊँगा

उतना दोषी कहलाऊँगा

फिर भी एक बात कहूँगा जरूर

गरीब माँ की छाती में दूध नहीं

शिशु रोता रहा रात भर

तुमने न पूछा हाल उस माँ का

लोटा भर कर दूध का

गंगा में बहा डाला 

मैंने पूछा जब माँ गंगा से

माँ गंगा को भी 

ऐसे पूत पर रोना आया

पर एक बात कही माँ गंगा ने

पाखंड है ये पाखंड है

कह देना सुनने वालों को

पाखंड है ये पाखंड है।



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