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अनजान रसिक

Inspirational

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अनजान रसिक

Inspirational

नयी शुरुआत नयी मैं

नयी शुरुआत नयी मैं

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हर साल का आगाज़ जागृत करता नया अंदाज़,नया समां

नई आशाओं ,नई उमंगों के संग हर कोई स्वागत करता नववर्ष का।

झड़ी सी लग जाती वादों की,कुछ अपने से,कुछ अपनों से किए जो, पिछले साल से कुछ और ज़्यादा ,

संकल्प लेते लोग कि ऐसा करेंगे,वैसे रहेंगे,पूरा करेंगे वो सपना अपना जो है अब तक आधा-अधूरा, अधपका सा।

कुछ अरमान हो जाते पूरे तो हजारों अधूरे- टूटे, टुकड़ों में बिखर के रह जाते,

कुछ अपूर्ण बिखरे सपने अगले साल संवरने के लिए स्थगित हो जाते।

इस बार भी नव वर्ष का हुआ है पुनः आगमन ,

पूरे मनोयोग से बुनने लगा सपने, ये मेरा बावला सा मन।

कि कैसे मिटा दूंगी मैं अपना सारा दुःख,सारा अवसाद,

जो यातनाएं दी ज़ालिम इस ज़माने ने , कैसे भुला दूंगी सभी को इस साल ।

सब का हिम्मत से सामना करते हुए उन्हें मुँह तोड़ जवाब दे जाऊंगी,  

भुला कर अपने सभी कष्ट,सभी दर्द ,जीवन खुल के जीने का रहस्य ढूंढ लाऊँगी ।  

ख्वाब कुछ नए भी संजो लूंगी, ग़मों के काले निशाँ दिल के पन्नों से मिटा के फेंक दूँगी,

अखियों के झरोखों से अश्क एक और, अब ना बहने दूँगी ।

टूटे थे जो ख्वाब कभी ,उनके अवशेष बीते वक़्त की समाधि में दफन कर दूँगी,

मुस्कुराहाट की वजह एक नई ढूंढ कर, जग को खुशनुमा और खुशहाल बना जाऊँगी।

बन्दिशों से आज़ाद होकर,बंधनों को तोड़कर,खुली हवा में सांस लूँगी सभी गमों को भूलकर ,

नई शुरुआत करूंगी कुछ ऐसे नए अतरंगी अंदाज़ में अब,बिलकुल बदली हुई, नयी-नयी सी “मैं” बनकर ...


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