STORYMIRROR

"निर्बाध "

"निर्बाध "

1 min
395

अपने धुन में हैं रमे हुए, अपने मुकद्दर की तलाश में, 

अपने साझी से पूछना क्या? वक्त की मार के मुसाफिर हम हैं । 

लौट के आ खड़े हुए हैं हम, जिस मुकाम को कभी छोड़ा था, 

वो भी दौर था मेरे निर्बाध का, ये भी दौर है कुछ उसी तरह का। 

रास्ते अटपटे मिले थे मुझे, सीधे रास्तों का मैं मुसाफिर था, 

आने में देर तो लगी फिर भी, राह और मंजिल भी बड़ी हो गई। 

बात जो अधूरी रह गई थी कभी, अब तो कायनात की भी तबीयत है। 

मौन होकर जो कभी सोचता हूं, 

अपने धुन में हैं रमे हुए, अपने मुकद्दर की तलाश में। 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Dr Abhishek Kumar Srivastava(अपने रीति-रिवाजों, परंपराओं में विश्वास, पूर्वजों के मान-सम्मान के दृष्टीकोण से कार्यों का संपादन,जयप्रकाश नारायण जी एवं गुरुदेव टैगोर जी को मार्गदर्शक मानना। )

Similar hindi poem from Abstract