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Umesh Shukla

Tragedy

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Umesh Shukla

Tragedy

नहीं मिला श्रमिकों को उचित परितोष

नहीं मिला श्रमिकों को उचित परितोष

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घर की याद बनी रहती है

सतत हर भावुक दिल में

पर उससे भी पिंड छुड़ाते

लाखों रहकर मुश्किल में

रोजी रोटी की खातिर वो

छोड़ देते अपना घर बार

धनार्जन में ही लगे रहते हैं

ताकि अभावों से पाएं पार

पर्वों और त्यौहारों का क्रम

उनको घर की याद दिलाए

मगर धनागम की आशा में

कर्मवीर उनको भी बिसराएं

बड़े महानगरों की रौनक सच

ऐसे लोगों से रहती गुलजार

धनार्जन की उम्मीद में जिसने

भुला दिया अपना घर परिवार

कर्मवीरों के बल पर चल रहे हैं

हर जगह छोटे बड़े कारखाने

इनके दम पर ही जग में चमक

रहे हैं तमाम औद्योगिक घराने

अधिकांश धनिकों को नजर ही

नहीं आता कर्मवीरों का त्याग

वो बड़े मुनाफे के लोभ में नहीं

देते श्रमिकों को वांछित लाभ

भारत की औद्योगिक दुर्दशा का

सबसे बड़ा कारण है बढ़ता लोभ

आजादी के 75 साल बाद भी नहीं

मिला श्रमिकों को उचित परितोष



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