STORYMIRROR

Umesh Shukla

Tragedy

4  

Umesh Shukla

Tragedy

हुईं मानवीय संवेदनाएं विनष्ट

हुईं मानवीय संवेदनाएं विनष्ट

1 min
17

कभी हर व्यक्ति सुनता

रहा बुलबुलों का गीत

पर अब की पीढ़ी नहीं है

बुलबुलों से ही परिचित

आज युग की आपाधापी

में खोए हुए हैं सब युवा

प्रकृति औ उसकी छटा से

उनका सामना नहीं हुआ

पशु, पक्षियों के जगत से

अनभिज्ञ अधिकांश जन

विकास के नाम पर जुटा

रहे बस भौतिक संसाधन

सूचना तकनीक के इस दौर में

हुईं मानवीय संवेदनाएं विनष्ट

ऐसे में लगातार बढ़ता जा रहा

चहुंओर मानव समाज का कष्ट

काश हम सभी मिल जुलकर

बनाते समाज को संवेदनशील

ताकि लोलुप शक्तियां कभी न

पाएं मानवीय मूल्यों को लील।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy