नारी को पूज अमरत पाओ
नारी को पूज अमरत पाओ
नारी को जिसने समझ लिया, देवत्व नर पाया।
नारी को वस्तु समझ, पशु नर नाहर कहलाया।
नारी से उद्भव सृष्टि का, नार बिन बुझे संसार।
वीर भद्र परशुराम पर, नारी का अजर साया।।
नारी का चितवन, ममतामई आँचल नारी का।
नर की शक्ति नारी, आजीवन संबल नारी का।
नारी की करुणा, नारी संग नर का अभिमान।
चट्टानों को तोड़ झरना, शक्तिशाली वारी का।।
नारी सा हृदय रख, पुरुष दयालु जाना जाए।
क्रूर हिंसक बन नर, कापुरुष ही माना जाए।
राधा मीरा को गुन, गोप जाए कृष्ण निकट।
नारी को कलंकित समझ, ग्रंथ आधा पाए।।
पहचान नयनों से, बातों से होता, अंत नहीं।
सीता बिन राम नहीं, राधा बिना संत नहीं।
अर्धनारीश्वर स्वरूप पहचान, तांडव संभव।
नारी बिन तारक ब्रह्म, कलिका पर्यंत नहीं।।
नारी का मोह मारक, श्री राम वन पर्वत भटके।
नारी के मन की बात मुकर, रावणांतक झटके।
नहीं चेते गर नर समझ, परिवार टूट जाते सारे।
नारी को समझ, तुलसीदास रामकथा चमके।।
नारी की पहचान कोमलता, देवता नर्म होते।
छल- प्रपंच नारी में, इंद्र सम मानव गर्म होते।
सदाशिव की गरिमा, पार्वती बिना असंभव।
महिलाओं को त्यागा, बन नेता बेशर्म रोते।।
