मूढ़मति सांप्रदायिकता के आसार
मूढ़मति सांप्रदायिकता के आसार
अब इन निः शंक के जुल्मों को,
सहन करना बंद करना होगा !
बनकर कायर और कमज़ोर,
अब रहना बंद करना होगा !
आज जैसे कोई एक हुआ है,
शिकार इनका बेकार में !
इस मूढ़ मति अँधे-बहरे,
सांप्रदायिकता के बाजार में !
अब जहाँ से विरोध के स्वर उठेंगे,
समझो अगला नंबर उसका है!
समझ नहीं आता वो धर्म-निरपेक्ष,
भारत देश अब किसका है !
कोई पूछो जाकर हत्यारों से,
किस खातिर ये खेल रचा था !
कयूँ हत्या करने से पहले,
यह बेमतलब का मेल रचा था !
इस घोर अराजकता के,
समय में मानवता को बचाना है!
अल्लाह, ईश्वर, गुरु और भगवन,
सब एक ही है, ये सबको बताना है !
