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Poonam Singh

Romance Classics

4  

Poonam Singh

Romance Classics

मुक्तक

मुक्तक

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फना हो जाऊँ तेरे प्यार में है तमन्ना मेरी, 

इजाजत ले लूं पहले तुझसे है इल्तिजा मेरी, 

जाने कब से हूँ मोहब्बत में तेरे,

जान चली न जाए कहीं चाहत में तेरी ।।


कभी तो पहलू में आया करो,

बातों-बातों में यूं मुस्कुराया करो, 

तेरी राहों में हम हैं दीवाने खड़े, 

कभी तो प्यार से मुझे निहारा करो ।। 


हजारों कांटे मिलेंगे मंजिल की राह में, 

न रुकेंगे कदम मेरे तेरी चाह में, 

इस कदर तूने दीवाना बनाया मुझे, 

बीते ये मेरी जिन्दगी बस तेरी पनाह में।। 

    

मैं जिंदगी जिंदादिली से जीना चाहती हूँ , 

परिंदे सी उन्मुक्त गगन में उड़ना चाहती हूँ,

 पर कटे न कभी मेरे इसलिए,

हर तूफां से टकराने का हुनर रखती हूँ।। 

   

तुझे अपना बनाना चाहती हूँ, 

तुझे दिल में बसाना चाहती हूँ, 

गुजारिश है बस इतना तुझसे,

तेरे दिल का एक कोना चाहती हूँ।।    


कितना लाजबाब लाजमी हो तुम, 

खिलता गुलाब सा हसीन हो तुम, 

तारीफ क्या करूँ मैं तेरी मेहरबां, 

उगता आसमान का चांद हो तुम ।। 

           -

मंजिल पाने के लिए दुनिया रास्ता ढ़ूंढ़ती है, 

पर मुकद्दर में क्या है यह नसीब ही तय करती है, 

 जिसकी जिद हो मंजिल पाने की, 

राहें खुद व खुद मंजिल तक पहुँचती है ।।       


यूँ बढ़ने लगी तेरी नजदीकियां, 

मुझको सताने लगी तेरी दूरियाँ, 

तेरे दिल के आशियाने में रखे हैं कदम हमने, 

अपना लो तुम मुझे तो, होगी तेरी मेहरबानियाँ।। 

   

हर कोई यहाँ अपना किरदार अदा करता है, 

फितरत जिसकी जैसी वो वैसा करम करता है, 

जो दूसरों की फिकर करता है हमेशा, 

खुदा भी ऐसे बन्दे को सलाम करता है।। 


हर नादानियों को तेरी वो सराहता रहा है, 

लब्ज खामोश थे बस तुझे निहारता रहा है, 

हुआ सामना दिले पत्थरों से जब, 

अपनी किस्मत पर वो अश्क बहाता रहा है ।। 


बिना तेरे जीना दुश्वार लगता है,

गर तुम हो तो हर दिन त्योहार लगता है, 

शजर के छांव सा तेरा प्यार, 

साथ तेरा मुझे एक उपहार लगता है ।।

  

तेरी यादों की खुश्बू में हम महकने लगे, 

नींद से जागकर हम मुस्कुराने लगे, 

रात सपने में मुझे तुम जो मिले, 

तेरी चाहत में हम युं भींगने लगे।।


हम तेरे इश्क में खुद को मिटा बैठे हैं, 

अब वो चैनोंकरार कहाँ, हम तो

अपनी दुनिया ही लुटा बैठे हैं, 

मुकद्दर में अब तुम नहीं मेरे, 

अब अपने सीने को पत्थर बना बैठे हैं।। 


कोई शिकवा नहीं किसी से, 

क्या कहूँ मैं और किसी से, 

पाकर बेखुदी तुम्हारी, 

बहुत परेशां हूँ मैं अपनी जिन्दगी से ।।    


मंजिल पाने के लिए दुनिया रास्ता ढ़ूंढ़ती है, 

पर मुकद्दर में क्या है यह नसीब ही तय करती है, 

 जिसकी जिद हो मंजिल पाने की, 

राहें खुद व खुद मंजिल तक पहुँचती है।। 


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