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Mahendra Kumar Pradhan

Drama

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Mahendra Kumar Pradhan

Drama

मुक्ति

मुक्ति

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एक अलग एहसास है

कैदियों को हमेशा

इसी की लगती प्यास है


जो बंद हैं पिंजरों में

उन परिंदों से पूछो

क्यों लुभाता आकाश है ?


मुक्तिमें,

एक अलग सी मिठास है

चेहरे में दमकता सदा

स्फूर्ति की आभास है


बेड़ियों से मुक्त बन्दों से पूछो

मुक्ति में कैसा मिठास और

कैसा एहसास है ?


मुक्ति में,

सुनील नभ के धूसर बादल

मुक्त हवा में डोले बिंदास

आजादी से जीते हैं


खुली समां में मदमस्त परिंदे

भरते उड़ाने, झुमके,

जीने की कला सिखाते हैं


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