मुक्ति की चाबी मिल जाये
मुक्ति की चाबी मिल जाये
जग के जंजाल में झुलसता है,
नारीत्व का मौन गूंगा हाड़ मांस का पिंजरा,
चीख़ न पाये,दम घुटता जाये,
ज़िम्मेदारियों से तन बोझिल होता जाये,
सभी दिशाओं में भ्रमित हो जाये,
उत्तर जाये तो बहू है,
दक्खिन जाये तो पत्नी है,
पूरब जाये तो मां है,
पश्चिम जाये तो बेटी है,
बंदिशों में घायल मृत अरमान है,
दायित्वों के साये में अपनों से लहुलूहान है,
न आसमां का रथ, न जमीं की छत,
छटपटाटे सीने की घाटियों के इस पिंजरे को,
काश मुक्ति की कोई चाबी मिल जाये,
क़ैद तक़दीर की ख़्वाहिशें खिल जाये,
परिधि लांघकर मिल जाये,
स्वावलंबन,आत्मनिर्भरता का खुला पिंजरा,
जहां ठहराव हो, मिले अस्तित्व को एक दिशा।
