STORYMIRROR

aazam nayyar

Abstract

4  

aazam nayyar

Abstract

मुहब्बत की नजर

मुहब्बत की नजर

1 min
183

निगाहें अश्कों में ही तर रही है!

यादें दिल पे देती नश्तर रही है 


मुहब्बत की नजर से क्या देखेगा

वो आंखों प्यार से बंजर रही है


सहारा दें वफ़ा से जो हमेशा 

निगाहें ढूंढ़ती वो दर रही है 


उल्फ़त के तीर कब मुझसे चलाये 

चलाती वो आंखें ख़ंजर रही है


दिखाकर बेवफ़ाई की वो आंखें 

 मेरे दिल पे देती नश्तर रही है


कभी भी भेज उल्फ़त के नहीं गुल 

नफ़रत के मारती पत्थर रही है


सकूं आज़म नहीं है एक पल भी

परेशां उसकी यादें कर रही है! 

आज़म नैय्यर 


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract