मसला मुसीबतों का
मसला मुसीबतों का
क्यों मसला मुसीबतों का सुलझता नहीं
झूठ की आग से भी सच झुलसता नहीं
जग की सुनी औ' समझा हमको गलत-
दुःख इस बात का है, तू समझता नहीं..
परेशानियां हो जायेंगी ख़त्म धीरे-धीरे ..
बोल क्यों भला इनसे तू उलझता नहीं..
शायद किस्मत ही है कुछ तो रूठी हुई-
ऐसा नहीं तू गिर-गिरकर संभलता नहीं..
एतबार हमें है तेरे सभी वादों पर सखे-
कभी मौसमों-सा तो तू बदलता नहीं..
नाराजगी-ख़ामोशी सब अपनी जगह-
ऐसा नहीं एहसास से मन मचलता नहीं..
बात तो प्रेम-समर्पण की है 'आईना'
कैसे कह दूँ कि पत्थर पिघलता नहीं..

