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Sailesh Srivastava

Romance

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Sailesh Srivastava

Romance

मोहब्बत का करम

मोहब्बत का करम

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बिना छुए ही छु लेता हूँ तुम्हें मेरी शायरी का करम है,


पल भर भी मुझसे दूर है तू ये तो बस तेरा भरम है,


कसम से कहता हूँ मान ले मेरी ये बात,


इक तेरे साथ के लिये ही तो हुआ मेरा जनम है।


कीमत क्या चुकाऊंगा इसकी मुझे भी इसका इल्म नहीं,


गवां दूँ ख़ुद को भी तेरे लिए तो भी कोई गम नहीं,


कयामत को भी ये हक़ ना मिले ऐ खुदा जुदाई का,


इससे बड़ा जहाँ में मेरे लिए कोई सितम नहीं।


किसी से ग़र तुलना करूँ तो तौहीन होगी मेरे इश्क़ की,


इस जहाँ में फिर मेरे लिए ऐसा दूसरा गुनाहे असीम नहीं,


मेरे जज़्बातों को गलत ना समझना कभी तू,


तुझसे ही तो बनी मेरी ये मोहब्बत - ए - जमीन है।


बस किस्मत वाला समझता हूँ खुद को तुझे पाकर,


ग़र तुझे मैं खो दूँ तो मेरी जिन्दगी पर तौहीन है।


माफ़ी है ऐ खुदा ग़र चाहा महबूब को तुझसे बढ़कर,


तेरा ही नजराना है जो तुझसे मैंने पाया है।


सोच में डूबा हूँ कि मेरे महबूब को तूने बनाया है,


या तू ख़ुद मेरा महबूब बन कर मेरी दुनिया में आया है।


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