मन क्यों आसक्त रहता पगले
मन क्यों आसक्त रहता पगले
भला क्यों आसक्त रहता मन विलास के लिए :
जीवन व्यर्थ गंवा रहा पगले झूठी आस के लिए !
अद्भुत आकर्षण कामिनी की प्यारी अदाओं में :
मन खग बसता उसके शरीर की कंदराओं में !
अधरों पे मुस्कान उसकी जैसे खिली चमन कली :
मुख कांति मनोहारी देख बाँछें जाती हैं खिली !
रूप मोहनी उसकी हर पल लुभाती कुछ ऐसे :
सिर झुकाए हुए कुमोदनी को चन्द्र लुभाए जैसे !
मुक्ति का मार्ग यह कदापि नहीं हो सकता प्रिय :
मत कामना के पीछे भागो बाद में लगे जो अप्रिय !
शांति मिले ज़ब ईश्वर अपनी चरण शरण बिठावै :
अन्तर्मन व रोम रोम में बस दीनानाथ बस जावै !
