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अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Abstract

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अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

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मन की बात

मन की बात

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विचारहु जन सब तुम अपने मन की बात,

बहुत हुयी अब मिथ्या मंच से मन की बात।

तुम्हार नृप राम पद नहिं सिर नाई,

अब ह्रदय में रही वह अहमियत भाई।

जनता का सब मन देख बिचारी,

नहीं हमार यह सेवक हितकारी।

न कहो अब तुम सहित अभिमाना,

क्रपा समाज नहीं सकल जनमाना।

न रुख न बचन न दिल में श्रीराम,

तुम्हरें सुमिरन सत्ता के रहे न भगवान।


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