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Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

मन जल रहा है

मन जल रहा है

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मेरा मन जल रहा है,आंख रो रही है

ये कैसी सावन की बारिश हो रही है

हर तरफ दिख रहा खून-खराबा है,

कोई जगह नही बची अब काबा है,

टूट गया आज इंसानियत का पत्थर,

मानवता आज मानवों की खो रही है

मेरा मन जल रहा है,आंख रो रही है

दुःखी अब समंदर है,हर शख्स बंदर है,

जिधर देखो उधर ही उधारी हो रही है

सबके यहां पर अपने-अपने चराग़ है,

सबके यहां पर अपने-अपने अंधेरे है,

पर सच मे यहां विजय वही होता है,

जिसकी सांसे सत्य से रोशन हो रही है

वो फूल ही अधिक देर तक महकता है

जिसकी खुश्बु सत्य-समर्पित हो रही है

मेरा मन जल रहा है,आँख रो रही है।



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