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V. Aaradhyaa

Romance

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V. Aaradhyaa

Romance

मलंग मन

मलंग मन

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जब बहे बसंती पवन अलसाए तन 

होली के संग बावरा हो गया ये मन,

गुझिया,वड़ा,मिठाई और ठंढाई

होली के उन्माद को बढ़ाता भंग :

मधु छात से भर गए मकरन्द

होली के गीतों में प्रेम के छंद,

पैरों की थिरकन में है जंग

मन नाचने लगा हो के मलंग :

चहु ओर सखी बाजे मृदंग

रँग से भीगे अंग अंग,

छा रहा है चतुर्दिक अनंग

फ़ैल रही मस्ती की तरंग :

यादगार बन जाए ये सारे रँग 

तरु ले उमंग ज्यों वस्त्र हुए तंग,

उद्वेलित होकर हुए अतरंग

मैं खेलूं होरी अपने साँवरे के संग!


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