मजदूरन की दशा
मजदूरन की दशा
लिये भार अपने बच्चे का,
भार उठाने जाती है।
हाथ पैर लकड़ी जैसे,
मन भर बोझ उठाती है।।
१- पति डला है घर में उसके,
कमा कमा के लाती है।
इतना सब कुछ करती ही है,
संग पिटाई खाती है।
२-बुरी नजर जमींदार भी रखता,
कहता घर क्यों जाती है।
छोड़-छाड़ घर वाले को तू,
क्यों मरने खपने जाती है।
३-पति को माने परमेश्वर ही,
यही सोच सह जाती है।
चलती है कोल्हू की नाईं,
तनिक न वो सुस्ताती है।
४- अपने बच्चे की खातिर वो,
सारे कष्ट उठाती है।
आह निकलती कभी न मुख से,
जीती ऐसे जाती है।।
