STORYMIRROR

संदीप सिंधवाल

Tragedy

2  

संदीप सिंधवाल

Tragedy

मजदूर बंद

मजदूर बंद

1 min
191

डियर डायरी 

ये मजबूर है या 

मजदूर ये कमजोर है


या मजबूत चंद रोज से

दिहाड़ी नहीं


ये आपदा है 

या मगरुर।


पास पैसे नहीं

ना ही बसें हम ही


हम क्यों है फंसे

वो अफवाहों से हैं

घरों में 


हम भिखारी

से हैं दरों में।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy