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Zuhair abbas

Romance

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Zuhair abbas

Romance

मेरी खुशियों का कातिल !

मेरी खुशियों का कातिल !

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कभी ख्वाबों की ताबीर का सच ढूंढता हूं तो

कभी ना- मुकम्मल होने वाले ख्वाबों के खौफ से खुद को सोने नहीं देता ।

मेरी मुश्किलें मेरे सिरहाने इस तरह रहती हैं कि मैं चाहकर भी

ज़ख्मों से खुद को जुदा करने नहीं देता ।

जाने अनजाने हुईं जो खताएं मुझसे अबतक मेरे दामन से लिपटीं क्यों है?

क्यों इतने गिरयां पर भी मेरी ज़ात मेरे बीते गुनाहों का अज़ाला करने नहीं देती ।

ला हासिल की तमन्ना किए जाना

ना जाने कितनी दफा खुद को बीते लम्हों की ओर ले जाना

सोचता हूं मैं खुद अपनी खुशियों का कातिल तो नहीं।



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