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VIVEK ROUSHAN

Abstract

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VIVEK ROUSHAN

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मेरे साथ-साथ चलता है

मेरे साथ-साथ चलता है

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मैं कितना अकेला हो गया हूँ

शायद इसका तुम्हें अंदाज़ा भी न हो

वक़्त निरंतर बीतता जा रहा है

और मैं वक़्त के पीठ पर बैठ कर

चुप-चाप बस चलता जा रहा हूँ

कहाँ जाना है ?

कहाँ जा रहा हूँ ?

इस बात से मैं बिल्कुल अनजान हूँ

बे-मन हीं अपने जीवन

को मैं जिए जा रहा हूँ

जी भी रहा हूँ या नहीं

इसका भी पता नहीं चलता

कभी-कभार मेरे चेहरे पर

हँसी तो आ जाती है

पर ख़ुशी का चेहरा

कैसा होता है ?

कैसा था ?

ये मैं बिल्कुल भूल गया हूँ

हाँ ! दुःख जरूर हर वक़्त

मेरे साथ रहता है

मेरे साथ-साथ चलता है और

उस दुःख का चेहरा

हू-ब-हू मेरे जैसा लगता है।


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