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Vivek Netan

Abstract

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Vivek Netan

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मेरे झोपड़े को ना फूंक दो

मेरे झोपड़े को ना फूंक दो

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मंदिर मस्जिद पर राय पूछते हो मुझसे 

मैंने कब खाया था ये भी तो पूछ लो 

माना की रोशन करना है महल आपने 

इसके लिए मेरे झोपड़े को ना फूंक दो 


करते है मेरे फैसले चंद लोग मिल के 

मुझे क्या चाहिए मुझ से तो पूछ लो 

रोज लिखते हो हालात भूखो के  

कभी भूखे से नजर मिला के देख लो 


दुत्कार देते हो फकीर को दरवाजे से 

एक बार उसके मरे जमीर से पूछ लो 

कैसा होता है दर दर की ठोकरें खाना 

सहम जाओगे, सोच के तो देख लो 


ललचाई नजरो से देखते को जिन जिस्मो को 

बेबसी पूछनी हो तो उनके चीथड़ों से पूछ लो 

भूख कैसे मार देती है हर रिश्ते नाते को 

अपनी बेटी को बेचती किसी माँ से पूछ लो 


चलता फिरता तो हूँ में रोज इस शहर में 

मर चुका हूँ, चाहो तो मेरी रूह से पूछ लो 

अपनी ही नजरों में गिर जाओगे यकीनन 

कभी अजनबी बन अपने घर का पता पूछ लो।


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