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डॉ. प्रदीप कुमार

Inspirational

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डॉ. प्रदीप कुमार

Inspirational

मेरा संघर्ष

मेरा संघर्ष

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मीलों पैदल चले थे,

तब जाकर ये मंजिल आई थी,

पांव के छाले गवाह हैं,

कोई सिफ़ारिश नहीं लगाई थी,

राह बहुत कठिन थी,

ठोकर भी कई खाई थी,

ठिठक कर पांव ये कई बार रुके थे,

पर न फैलाया हाथ कभी,

न किसी के आगे झुके थे।

जुनून सर पे सवार था इतना,

अंधेरा देख न डरे थे,

कभी बैसाखी नहीं पकड़ी,

यूं लड़खड़ाकर तो कई बार गिरे थे।

हाथ दिया था किसी ने अपना बन,

पर बहुतों ने टांग भी खीचीं थी,

पर उनकी लकीर के बगल में

हमने जो खींची लकीर वो बड़ी थी।

संघर्ष खत्म नहीं होता है, सत्य है,

ये सब कुछ हमको पता है,

पर इन पर विजय जो दिलाती,

वो तलवार हमारी जिजीविषा है।


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