हंस चुगे जब दाना
हंस चुगे जब दाना
सादा जीवन उच्च विचार,
नकल करे तू क्यों बेकार।
देशी में है जो अपनत्व,
दूजे में कहां ऐसा समत्व।
शिक्षा का क्या ये आचार,
ऐसा करते क्यों व्यवहार ?
फैशन में भी एक संगत हो,
खिली-खिली सी रंगत हो।
शिष्टाचार से अपना नाता,
गर्वित जन किसको भाता।
अहंकार खो देता जीवंतता,
देने वाला कोई और नियन्ता।
प्रेमभरे हो स्नेहासिक्त रिश्ते,
भेद-भाव चक्की क्यों पिसते।
जननी का रखो न ख्याल,
मदर्स डे संदेश को बेहाल।
दिखावे का रोग बढ़ रहा,
घर-घर तेरा-मेरा हो रहा।
स्वांग रचा क्यों खुद छलते,
2रोटी को गैरों को तकते।
संस्कार तज लाज न आती,
तुम्हें देख आत्मा लजाती।
दिखावे के रोग को छोड़,
आध्यात्म को मुख मोड़।
जिसका काम उसी को साजे
और करे तो तोबा डंडा बाजै।
