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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Inspirational

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Inspirational

हंस चुगे जब दाना

हंस चुगे जब दाना

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सादा जीवन उच्च विचार, 

नकल करे तू क्यों बेकार। 


देशी में है जो अपनत्व, 

दूजे में कहां ऐसा समत्व।


शिक्षा का क्या ये आचार,

ऐसा करते क्यों व्यवहार ?


फैशन में भी एक संगत हो,

खिली-खिली सी रंगत हो।


शिष्टाचार से अपना नाता,

गर्वित जन किसको भाता।


अहंकार खो देता जीवंतता,

देने वाला कोई और नियन्ता।


प्रेमभरे हो स्नेहासिक्त रिश्ते,

भेद-भाव चक्की क्यों पिसते।


जननी का रखो न ख्याल,

मदर्स डे संदेश को बेहाल।


दिखावे का रोग बढ़ रहा,

घर-घर तेरा-मेरा हो रहा।


स्वांग रचा क्यों खुद छलते,

2रोटी को गैरों को तकते।


संस्कार तज लाज न आती,

तुम्हें देख आत्मा लजाती।


दिखावे के रोग को छोड़,

आध्यात्म को मुख मोड़।


जिसका काम उसी को साजे

और करे तो तोबा डंडा बाजै।


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