मदनोत्सव
मदनोत्सव
मन क्यों बहक रहा
कदम क्यों डगमगा रहे
क्यों नहीं चल रहा आज
खुद पे खुद का जोर
क्यों उड़ती धूल, खिलते फूल,
कोयल की कूक में, एक ही स्वर सुनाई दे रहा
किसी का हो जा, किसी को अपना ले
क्यों किसी पर मरने को,
क्यों किसी के लिए जीने को मन में है इतनी व्यग्रता
क्यों पूरी की पूरी प्रकृति मन को उकसा रही है
हाँ वसंत है, हाँ मदन उत्सव है
किसको खोज रहीं निगाहें
किसको तरस रही बाहें
क्यों कस के किसी को लिपटने को
क्यों किसी में सिमटने को, मन हो रहा अधीर
शिव भी छोड़ तप, पार्वती संग उत्सुक हुए
मैं तो साधारण नारी
मेरे लिए भी कोई दे रहा मौन निमंत्रण
आज तो पत्थर भी पिघल जाए
मैं तो फिर भी हाड़ मांस की
चलो सौंप दूंगी
वर्षो राह तकते प्रीतम को, स्वयं को
और पूर्ण करूँ अपना नारीत्व।

