मैं क्यों सुनू???
मैं क्यों सुनू???
क्यूँ सुनती हूँ ?
क्यूँ चलना चाहती हूँ,?
तुम्हारे अनुसार?
क्यूँ नहीं कर सकती तुम्हारा प्रतिकार,?
क्यूँ मेघ बनकर प्रेम रस बरसाना चाहती हूँ?
क्यूँ होने लगा है अब संदेह?
क्यूँ डगमगाने लगा विश्वास?
मै ठहरी नासमझ ,
तुम तो बारीकियों को समझते हो।
फिर क्यूँ नहीं महसूस की मेरे हृदय की नमी?
क्यूँ समझ के भी नासमझ रहे?
मुझ पर अहसान कर रहे हो या खुद पर?
ओह नाराज़ हो गये..
सुनो ,अभी न जाओ ।
ये जो सिलवटें आ गयी है न रिश्तो में
जरा इन्हें शब्दों की गरमाहट से
संवरने तो दो..
फिर बेशक चले जाना ।

