STORYMIRROR

Sachin Gupta

Inspirational

4  

Sachin Gupta

Inspirational

माटी का देवता

माटी का देवता

2 mins
389


मुहँ में कोई दाँत नहीं,

होठों पर कोई बात नहीं,

चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं,

जुबां पर कोई मिठास नहीं,

पेट में कोई आंत नहीं,

ऑंखों में कोई चश्मा नहीं,

हाथों में कोई डंडा नहीं

पैरों में कोई चप्पल नहीं,

तन पर पूरा कपड़ा नहीं

सोचों कौन हो सकता है वो

समझो कौन हो सकता है वो !

        

संग कोई अपना साथी नहीं,

त्यौहार कोई अभी अपना नहीं,

चेहरे पर थोड़ा-थोड़ा गम


बस दो बैलों को मान सहारा

हल जोतने चला वो

बजा के घंटी ,टन -टन

कंधे पर रख हल अपने

चला है आधी रात

क्योंकी नींद अब अपना नहीं,

बिस्तर अभी एक सपना ही सही

ख्वाब कोई अभी अपना नहीं

संग कोई सपना नहीं

सोचो कौन हो सकता है वो,

समझो कौन हो सकता है वो ?

                                      

मजबूत इरादे, बुलन्द हौसले 

बेखौंफ लगन, ठोस श्रम

करता रहता खेतों पर काम

जेठ की जलती दोपहरी में,

घूम रहा क्यों खेतों में?

तप रहा बेलों के संग ,

छाँव का कोई ख्याल नहीं

कौन हो सकता है वो सोचो ?

समझो कौन हो सकता है वो

                              

बरस रहा घनघोर सावन

पर भीग रहा है, क्यों वो इन्सान,

चाय-पकौड़ा अभी अपना नहीं

ला दी खेतों में अब हरियाली

पर अगोर रहा अभी भी वो इंसान

पूस की सर्दी आ गई

माघ की ओंस भीगा रही

पूरे धरती को कँपा रही 

फिर भी जाग रहा है वो इंसान

तन पर कम्बल का टुकड़ा

कॉंप रहा है अभी भी वो इंसान

सोचो कौन है हो सकता है, वो इंसान?

समझो कौन हो सकता है वो !


लग रहा धरती का दुलारा

उगा रहा धरती से सोना

अरे यह नर है या नारायण

या है कोई भगवान

या है कोई अवतार

कौन है वो इंसान,

जो उगा रहा सबके लिए अन्न

कौन हो सकता है वो?

समझो कौन हो सकता है वो


अरे यह है मेरे भारत का

मेरे गॉंव का,

मेरे देश का किसान

कहते है जिसको

माटी का देवता।


                                             


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Inspirational