मासूमियत
मासूमियत
उनकी मासूमियत
उनकी मासूमियत
जैसे खिलता फूल कोई,
उनकी नाराज़गी
जैसे टूटा फूल कोई।
ओस की नमी में
भीगे हैं फूल कोई,
उनके दीदार को
तरसते हैं हर रोज़ कोई।
उनसे मिलना
या बिछड़ना,
ये तो वक़्त की बात है,
पर रोज़ उनका
नया दीवाना होता हर कोई।
मेरा दिल तो टूटा नहीं उनसे,
ऐसा भी नहीं कहता
मेरा कोई नाता नहीं उनसे।
हम तो उनकी ख़ुशी के पहरेदार हैं,
इससे ज़्यादा वादा नहीं उनसे।

