मैं इश्क़ करूँगा
मैं इश्क़ करूँगा
मैं इश्क़ करूँगा ऐ उम्र, तू इंतज़ार करेगी क्या?
अभी मैं घर बनाने में व्यस्त हूँ,
तुम मेरे बनाए घर में रहने आओगी ना?
मैं पूछ नहीं रहा तुमसे,
उम्मीदें लगा रहा हूँ।
मेरी उम्मीदों को तुम हक़ीक़त बनाओगी ना?
बताओ ना,
मैं तुमसे कुछ पूछ रहा हूँ।
पूछे हुए सवालों का जवाब
इतनी देर से बताओगी क्या?
क्या...
क्या तुमने सुना है,
ये हक़ीक़त है, कोई अफ़साना नहीं!
अच्छा,
तो मैं चल रहा हूँ।
तुम विरह की अग्नि में तप पाओगी क्या?
क्या मैं इस “क्या” को ख़त्म कर दूँ?
मेरी कविता पूरी मानी जाएगी क्या?

