मानव मन में अड़चन
मानव मन में अड़चन
आज बदल रहा परिवेश यहाँ का,
जीवन उपयोगी है सब साधन !
विकसित अपने को कहलाते,
नव रीति नीति और नव दर्शन !
मानव कितना बदला कितना अब,
सकल समाज जिनसे है रौरव !
जाति वर्ग और राज्य फेर में,
छिड़ा भयंकर विपदा का विप्लव !
स्वर्ग खण्ड इस पुण्य भूमि पर,
अगणित नर आहुति देते निष्ठुर !
स्वयं की ही साम्राज्य लालसा,
अपने मद में है मानव मन अंतर !
भौतिक मद में है फँसी आत्मा,
उनसे ना हो पाएगा कोई निश्चय !
मानव को तो समझाना होगा,
तभी होगा देश काल पर विजय !
