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V. Aaradhyaa

Tragedy

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V. Aaradhyaa

Tragedy

मानव मन में अड़चन

मानव मन में अड़चन

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   आज बदल रहा परिवेश यहाँ का,

          जीवन उपयोगी है सब साधन !

   विकसित अपने को कहलाते,

           नव रीति नीति और नव दर्शन !


मानव कितना बदला कितना अब,

        सकल समाज जिनसे है रौरव !

जाति वर्ग और राज्य फेर में,

       छिड़ा भयंकर विपदा का विप्लव !


स्वर्ग खण्ड इस पुण्य भूमि पर,

        अगणित नर आहुति देते निष्ठुर !

स्वयं की ही साम्राज्य लालसा,

         अपने मद में है मानव मन अंतर !


भौतिक मद में है फँसी आत्मा,

       उनसे ना हो पाएगा कोई निश्चय !

मानव को तो समझाना होगा,

        तभी होगा देश काल पर विजय !


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