माँ
माँ
इस दुनिया को जो स्वर्ग बना दे
वह मुकम्मल मुकाम है माँ
रिश्तों के तो हजारों रूप
स्वार्थ जुड़े, जरूरी अनुरूप
निःस्वार्थ रिश्ते को सर्ग बना दे
वह आशाओं का आयाम है माँ
इस दुनिया को जो स्वर्ग बना दे
वह मुकम्मल मुकाम है माँ
भावी रचना कौन न संजोता है
बिन पाये वो कुछ न खोता है
बिन पाए देना, जो फर्ज बना ले
वह अविरल एहसान है माँ
इस दुनिया को जो स्वर्ग बना दे
वह मुकम्मल मुकाम है माँ
आंखें जो नम अपनों के खातिर
कर दे न्यौछावर सब कुछ आखिर
घर जहान को जो स्वर्ग बना दे
वह पाक अरमान है माँ
इस दुनिया को जो स्वर्ग बना दे
वह मुकम्मल मुकाम है माँ
उद्भव समृद्धि सोच में जिसकी
सुख शान्ति का चमन है सिंचती
ईश विनय में इसे अर्ज बना ले
वह पूजित सकल धाम है माँ
इस दुनिया को जो स्वर्ग बना दे
वह मुकम्मल मुकाम है माँ
