माँ शाकम्भरी
माँ शाकम्भरी
आदिशक्ति मां अंबे का।
प्रतिबिंब बने हम दुर्गा का।
स्तवन करें अनंता का।
चंद्रघंटा, कूष्मांडा का।
धूप-दीप नैवेद्य लगाकर ।
मां के चरणों में ध्यान लगाकर।
उपवास करें अलक्ष्या का।
एका, नैका, सत्या का।
निष्प्राणों में प्राण भरती।
मां कल्याणी जगदंबा।
शक्ति का वरदान देती।
कालरात्रि, महातपा।
वीर रौद्र से सशक्त करती।
रौद्रमुखी, अनंता।
प्रभा मंडल आलोकित करती।
सती, साध्वी, नित्या।
दया धर्म प्रस्फुटित करती।
ब्राह्मी, ऐन्द्री, आर्या।
शुचिता का महत्व बताती।
शाकम्भरी, सत्या।
शांति खुशी स्थापित करती।
रत्न प्रिया, अपर्णा।
गंगा जल सी पवित्र करती ।
शिवदुती, अनंता।
माता के दरबार में,
सच्चा भक्त जो आएगा ।
संवेदनाओं से भर जाएगा।
मन तृप्त हो जाएगा।
सुख-संतोष वो पाएगा।
मोक्ष मार्ग खुल जाएगा।
आत्मलीन हो वह गाएगा।
तन-मन पावन हो जाएगा।
माता का स्वागत कर,
आल्हादित हो जाएगा।
दुष्कर्मों का अवसान करती।
परिस्थितियाँ सहज सामान्य करती।
मां अपने भक्तों का हर हाल में कल्याण करती।
नित्य निरंतर स्तवन से मन प्रमुदित हो जाता है।
मां के प्रभा मंडल में स्थान हमें मिल जाता है।
