STORYMIRROR

Abhishek Singh

Tragedy

3  

Abhishek Singh

Tragedy

माहवारी भाग-1

माहवारी भाग-1

1 min
12.4K

स्त्री हो तुम डरती हो,

जब कभी माहवारी से लड़ती हो।

सोच ऐसी बनाई सबने,

माहवारी में हुई पराई सबमें।


पाप है क्या ये ? जो न किया तुमने,

कुदरत से ही तो पाया तुमने।

दिया जन्म अपनों को ही,

खुद का तिरस्कार कराने को।


स्त्री हो तुम डरती हो,

जब कभी माहवारी से लड़ती हो।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy